शोभना शर्मा। राजस्थान में अद्भुत और प्राचीन मंदिरों की परंपरा रही है, लेकिन झालावाड़ जिले के झालरापाटन में स्थित सरला माता का मंदिर अपने आप में अनूठा उदाहरण है। स्थानीय मान्यता है कि यह मंदिर नगर की रक्षा के लिए 200 साल पहले उड़कर यहां आया था और तब से आज तक बिना नींव के ही खड़ा है। इस मंदिर की विशेषता और यहां की धार्मिक मान्यताएं इसे राजस्थान का एक दुर्लभ शक्ति धाम बनाती हैं।
सरला माता मंदिर के उड़कर आने की कथा
झालरापाटन के महात्मा गांधी कॉलोनी और बस स्टैंड क्षेत्र में स्थित यह मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है। बुजुर्गों के अनुसार, जब झालरापाटन नगर बसाया गया तो उसकी रक्षा के लिए उत्तर दिशा से सरला माता का मंदिर उड़कर इस स्थान पर आकर टिक गया। यह मंदिर तब से लेकर आज तक बिना किसी नींव के उसी तरह जमीन पर स्थित है।
स्थानीय बुजुर्ग महिला बताती हैं कि इस मंदिर को यहां आए हुए लगभग 200 वर्ष हो चुके हैं। प्रारंभ में मंदिर एक मंजिला था और सपाट जमीन पर खड़ा था। कुछ वर्ष पहले नगरपालिका ने जीर्णोद्धार कार्य कर इसकी दूसरी मंजिल पर सीमेंट के स्तंभों के सहारे छत डलवाई और फर्श एवं पुताई का काम कराया।
स्थापत्य और संरचना
प्राचीन स्वरूप में मंदिर में केवल सीढ़ियां थीं, जिन पर चढ़कर भक्त माता के दर्शन करते थे। जहां पहले देवी की मूर्ति एक कक्ष में स्थापित थी, वहीं अब नगरपालिका के कार्यों के चलते मंदिर का स्वरूप और विस्तृत हो गया है।
मंदिर में तीन द्वारों का स्थापत्य आज भी 18वीं सदी की झलक दिखाता है। भूतल पर विशाल कक्ष हैं, जिनके मध्य प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस द्वार से नौ सीढ़ियां ऊपर चढ़कर भक्त मुख्य मंडप में पहुंचते हैं। मंडप के बाद चौकोर अंतराल कक्ष आता है और इसी के मध्य गर्भगृह स्थित है।
अखंड ज्योत और पूजा परंपरा
मंदिर के पुजारी विश्वभरदयाल शर्मा के अनुसार यहां बरसों से अखंड ज्योत जल रही है। प्रतिदिन सुबह-शाम भक्त मिलकर माता की आरती और पूजा करते हैं। यह मंदिर पूरी तरह से सार्वजनिक है और इसकी देखरेख आसपास के श्रद्धालु ही करते हैं।
तीन फीट ऊंची पाषाण शिला पर मूर्ति
इतिहासकार ललित शर्मा के अनुसार मंदिर के गर्भगृह में तीन फीट ऊंची पाषाण शिला पर 18वीं सदी की दुर्लभ दुर्गादेवी की मूर्ति अंकित है। इस मूर्ति में देवी सिंह पर सवार दिखाई देती हैं और उनके चार हाथों में तलवार, डमरू, त्रिशूल और पुष्प का अंकन है।
देवी पारंपरिक आभूषणों से अलंकृत हैं, जो उस काल की मूर्तिकला की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। देवी के शीश पर सुंदर किरीट मुकुट भी अंकित है। मंदिर के बाहर देवी मुख के साथ गणेश और कार्तिकेय की लघु मूर्तियां भी स्थापित हैं।
मंदिर परिसर की अन्य मूर्तियां
मंदिर के अंतराल में दाहिनी ओर बने चबूतरे पर प्राचीन शिवलिंग स्थापित है, जहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना होती है। इसके निकट ही सुखासन में बैठे त्रिमुखी कार्तिकेय की दो हाथ वाली मूर्ति और गणेश की मूर्ति विराजमान है। माना जाता है कि ये दोनों मूर्तियां मूलतः चंद्रभागा मंदिर क्षेत्र की थीं, जिन्हें यहां लाकर स्थापित किया गया।
नगर रक्षा के लिए निर्मित धाम
इतिहासकार मानते हैं कि यह मंदिर 18वीं सदी में नगर की रक्षा के उद्देश्य से बनवाया गया था। दुर्गा की मूर्ति को पाषाण शिला पर अंकित कर स्थापित किया गया और इसी कारण इस मंदिर को आमजन ने ‘शिला से बनी सरला माता’ कहा, जो आज भी प्रचलित नाम है।


