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हाईकोर्ट की टिप्पणी: निर्वाचन आयोग मूकदर्शक नहीं बन सकता

हाईकोर्ट की टिप्पणी: निर्वाचन आयोग मूकदर्शक नहीं बन सकता

मनीषा शर्मा। राजस्थान हाईकोर्ट ने नगर निकाय चुनाव में हो रही देरी पर गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग संविधान की मंशा के विपरीत मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकता। जस्टिस अनूप कुमार की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि नगर निकायों के पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने से पहले या अधिकतम छह माह के भीतर चुनाव कराना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। इसके बावजूद राजस्थान में कई नगर निकायों का कार्यकाल जनवरी 2025 में समाप्त हो चुका है और छह माह से अधिक बीत जाने पर भी चुनाव नहीं कराए गए हैं।

अनुच्छेद 243 (U) का हवाला

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 243 (U) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान स्पष्ट रूप से बताता है कि नगर निकायों के चुनाव समयसीमा के भीतर कराए जाने चाहिए। चुनाव टालना न केवल इस अनुच्छेद का उल्लंघन है बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ भी खिलवाड़ है। हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव में देरी से स्थानीय स्तर पर शासन प्रभावित होता है और विकास कार्यों पर भी सीधा असर पड़ता है।

पंचायतों के विलय और प्रशासक नियुक्ति पर सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने 2021 में हुई प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए। उस समय कुछ पंचायतों का नगरपालिकाओं में विलय किया गया था और उन पंचायतों के सरपंचों को संबंधित नगरपालिकाओं का चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया। बाद में जब उनका पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा हुआ, तो उन्हें पद से हटा दिया गया और चेयरमैन का कार्यभार उपखंड अधिकारियों को प्रशासक के रूप में सौंप दिया गया।

हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के विपरीत है। चुनाव कराए बिना प्रशासकों को लंबे समय तक पद पर बनाए रखना संविधान की भावना का उल्लंघन है।

निकाय चुनाव में देरी से लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित

अदालत ने कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद नियमित और समय पर चुनाव हैं। यदि निर्धारित समय पर चुनाव नहीं होते, तो जनता की भागीदारी खत्म हो जाती है और शासन में पारदर्शिता भी प्रभावित होती है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, लेकिन यहां आयोग मूकदर्शक बना हुआ है।

मुख्य सचिव और निर्वाचन आयोग को निर्देश

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को कड़े निर्देश दिए। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव, राज्य निर्वाचन आयोग और भारत निर्वाचन आयोग को कहा कि वे इस मामले की गहन जांच करें और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप शीघ्र आवश्यक कदम उठाएं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव में अनावश्यक देरी से आम जनता को नुकसान होता है और स्थानीय निकायों का महत्व कम हो जाता है। इसलिए यह सुनिश्चित किया जाए कि नगर निकाय चुनाव जल्द से जल्द संपन्न हों।

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