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राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियां अटकी: पौने दो साल से नेताओं को इंतजार

राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियां अटकी: पौने दो साल से नेताओं को इंतजार

मनीषा शर्मा। राजस्थान में भाजपा सरकार के मौजूदा कार्यकाल को लगभग पौने दो साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक राजनीतिक नियुक्तियों की प्रक्रिया अधूरी पड़ी है। अब तक केवल नौ बोर्ड और आयोगों में अध्यक्षों की नियुक्ति की गई है, जबकि राज्य में 60 से अधिक बोर्ड और आयोग सक्रिय हैं। इस देरी से पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता असंतुष्ट दिखाई दे रहे हैं।

अब तक सिर्फ 9 बोर्ड-आयोगों में नियुक्तियां

राज्य सरकार ने अब तक जिन बोर्ड-आयोगों में नियुक्तियां की हैं, उनमें देवनारायण बोर्ड, राजस्थान राज्य अनुसूचित जाति वित्त विकास आयोग, माटी कला बोर्ड, किसान आयोग, राज्य जीव जंतु कल्याण बोर्ड, धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण, सैनिक कल्याण बोर्ड और राज्य वित्त आयोग शामिल हैं। हाल ही में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी को राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।

इस नियुक्ति के बाद माना जा रहा था कि अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी एडजस्ट किया जाएगा, लेकिन राजनीतिक नियुक्तियों की नई लिस्ट फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।

इंतजार कर रहे हैं ये वरिष्ठ नेता

भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं को राजनीतिक नियुक्तियों का लंबे समय से इंतजार है। इनमें पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी, सतीश पूनिया, पूर्व नेता प्रतिपक्ष स्व. राजेंद्र राठौड़ (जिनके निधन के बाद उनके समर्थक नेताओं को उम्मीद है), पूर्व राज्यसभा सांसद नारायण पंचारिया, कांग्रेस से भाजपा में आए महेंद्रजीत सिंह मालवीया, सुमन शर्मा और पूजा कपिल मिश्रा जैसे नाम प्रमुख हैं।

सूत्र बताते हैं कि सतीश पूनिया का नाम राष्ट्रीय संगठन के लिए भी चर्चा में है। वहीं, राज्य स्तर पर जन अभाव अभियोग निराकरण समिति, हाउसिंग बोर्ड, आरटीडीसी अध्यक्ष, बीस सूत्री कार्यक्रम उपाध्यक्ष और महिला आयोग की अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं।

राजनीतिक समीकरण और आलाकमान की रणनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा आलाकमान इन नियुक्तियों के जरिए दोहरा लाभ उठाना चाहता था। पहला, विधानसभा चुनावों में टिकट से वंचित या हारने वाले नेताओं को संगठन से जोड़े रखना। दूसरा, विपक्ष के खिलाफ मजबूत चेहरों को तैयार करना। हालांकि, अब तक हुई देरी से यह रणनीति अधूरी रह गई है।

प्रदेश में कई दिग्गज नेता अपने-अपने समर्थकों के साथ इन पदों की ओर देख रहे हैं। खासकर वे नेता जो चुनाव में हार गए या टिकट से वंचित रह गए, वे राजनीतिक नियुक्तियों के जरिए खुद को सक्रिय बनाए रखना चाहते हैं।

कार्यकर्ताओं में भी नाराजगी

राज्य के कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला और सरकार बने लगभग 21 महीने हो गए, तो राजनीतिक नियुक्तियां क्यों नहीं की जा रही हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि नियुक्तियों से संगठन मजबूत होता है और कार्यकर्ताओं को भी संदेश मिलता है कि उनकी मेहनत की कद्र की जा रही है।

विपक्ष के लिए अवसर

राजस्थान में कांग्रेस लगातार भाजपा सरकार पर सवाल उठा रही है कि क्यों वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जा रहा है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा आलाकमान और राज्य नेतृत्व के बीच तालमेल की कमी है, जिस वजह से नियुक्तियां अटक गई हैं।

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