शोभना शर्मा, अजमेर। शहर में स्थित विश्वविख्यात अजमेर शरीफ दरगाह एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। दरगाह परिसर में शिव मंदिर होने के दावे पर चल रहे प्रकरण की सुनवाई शनिवार को स्थानीय सिविल कोर्ट में हुई। इस सुनवाई में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) और अल्पसंख्यक विभाग की ओर से दाखिल प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिया। वहीं, दरगाह कमेटी की ओर से दी गई अर्जी पर बहस जारी रखते हुए अदालत ने अगली तारीख 1 नवंबर 2025 तय की है।
अदालत परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम
इस संवेदनशील मामले को देखते हुए कोर्ट परिसर और आसपास के इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। पुलिस और प्रशासन ने किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से बचने के लिए पूरी चौकसी बरती। कोर्ट की कार्रवाई के दौरान वकीलों और अधिकारियों की मौजूदगी में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं।
याचिकाकर्ता का दावा और विभागों का विरोध
यह मामला उस समय शुरू हुआ जब हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष और दिल्ली निवासी विष्णु गुप्ता ने दावा किया कि अजमेर दरगाह परिसर में संकट मोचन शिव मंदिर स्थित है। उन्होंने अदालत से प्रार्थना की थी कि वहां पूजा-अर्चना में किसी भी तरह की रोक नहीं लगनी चाहिए। इस दावे का दरगाह कमेटी और केंद्रीय पुरातत्व मंत्रालय ने जोरदार विरोध किया। मंत्रालय के वकीलों ने कोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता ने प्रकरण दायर करने से पहले विधिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। इसलिए याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जाना चाहिए।
30 अगस्त की सुनवाई में उठे सवाल
30 अगस्त को हुई पिछली सुनवाई में ASI और अल्पसंख्यक विभाग ने कोर्ट को यह बताया था कि याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता ने दावा करने से पहले जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की। इस आधार पर उन्होंने अदालत से याचिका खारिज करने की मांग की थी। इसके जवाब में गुप्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि यह ज्यूरीडिक्शन (अधिकार क्षेत्र) का मामला है और इसके लिए प्रार्थना-पत्र दाखिल करना अनिवार्य नहीं है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शनिवार को अदालत ने विभागों की अर्जी खारिज कर दी।
दरगाह कमेटी की अर्जी पर सुनवाई जारी
हालांकि, अदालत ने इस प्रकरण में दरगाह कमेटी की ओर से दाखिल अर्जी पर सुनवाई को जारी रखा है। इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 1 नवंबर 2025 की तारीख निर्धारित की गई है। तब तक दोनों पक्षों को अपने-अपने पक्ष को और अधिक स्पष्ट करने का अवसर मिलेगा।
ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व से जुड़ा विवाद
अजमेर दरगाह, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह होने के कारण विश्व प्रसिद्ध है। यहां हर साल लाखों की संख्या में देश-विदेश से जायरीन आते हैं। वहीं, याचिकाकर्ता के दावे के अनुसार, दरगाह परिसर में पहले संकट मोचन शिव मंदिर था, जिसे संरक्षित धार्मिक स्थल के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। यह दावा संवेदनशील है क्योंकि यह सीधे तौर पर धार्मिक आस्थाओं और ऐतिहासिक तथ्यों से जुड़ा हुआ है। दरगाह कमेटी का कहना है कि परिसर पूरी तरह से दरगाह का हिस्सा है और यहां किसी मंदिर का अस्तित्व साबित नहीं किया जा सकता।
प्रशासन की अपील
सुनवाई के बाद जिला प्रशासन ने आमजन और स्थानीय समुदायों से अपील की है कि वे अदालत की कार्यवाही का सम्मान करें और शांति बनाए रखें। किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें और केवल अदालत के आदेशों पर भरोसा करें।
आगे की राह
अब मामला पूरी तरह से अदालत के हाथ में है। 1 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि याचिकाकर्ता का दावा आगे बढ़ेगा या इसे खारिज कर दिया जाएगा।


