शोभना शर्मा। भरतपुर जिले के बयाना गवर्नमेंट कॉलेज से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां अंग्रेजी विषय में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर सवाई सिंह गुर्जर पर फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट लगाकर सरकारी नौकरी हासिल करने का आरोप लगा है। जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) हॉस्पिटल में हुई ताजा जांच में यह साफ हो गया कि सवाई सिंह वास्तव में केवल श्रवण दिव्यांग (हियरिंग इमपेयरमेंट) हैं, लेकिन उन्होंने जो प्रमाणपत्र लगाया उसमें उन्हें ‘मूक-बधिर’ (Deaf & Mute) श्रेणी का अभ्यर्थी बताया गया था। यह खुलासा राजस्थान पुलिस की विशेष टीम SOG की जांच में हुआ है, जिसने हाल ही में राज्य में दिव्यांग प्रमाणपत्रों से नौकरी पाने वाले अभ्यर्थियों की बड़े पैमाने पर जांच शुरू की थी।
कैसे हुआ खुलासा?
राजस्थान सरकार के आदेश पर SOG ने उन सभी सरकारी कर्मचारियों की जांच शुरू की थी, जिन्होंने दिव्यांगता कोटे में नौकरी हासिल की है। इसी क्रम में भरतपुर के बयाना गवर्नमेंट कॉलेज में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर सवाई सिंह गुर्जर को जयपुर के SMS हॉस्पिटल बुलाया गया। 29 जुलाई को हुई मेडिकल जांच में BERA (Brainstem Evoked Response Audiometry) टेस्ट किया गया, जिसमें साफ हो गया कि सवाई सिंह केवल श्रवण दिव्यांग हैं। जबकि उनके पास मौजूद ऑनलाइन सर्टिफिकेट में उन्हें ‘मूक-बधिर’ (Deaf & Mute) दर्ज किया गया था।
इस रिपोर्ट के बाद SOG ने 6 अगस्त को फर्जी प्रमाणपत्रों से नौकरी पाने वाले 24 अभ्यर्थियों की सूची जारी की, जिसमें सवाई सिंह का नाम भी शामिल था। जांच रिपोर्ट में उन्हें नौकरी के लिए अयोग्य करार दिया गया है।
कब और कैसे लगी नौकरी?
जानकारी के मुताबिक, सवाई सिंह गुर्जर मूल रूप से करौली जिले के हिंडौन सिटी के वार्ड नंबर 58 के रहने वाले हैं। दिसंबर 2022 से वह बयाना गवर्नमेंट कॉलेज में इंग्लिश विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं। बताया जा रहा है कि उन्होंने 2018 में ऑनलाइन दिव्यांग प्रमाणपत्र जारी करवाया था, जिसमें उन्हें मल्टीपल डिसेबिलिटी यानी मूक-बधिर बताया गया। इसी सर्टिफिकेट के आधार पर उन्होंने सरकारी नौकरी हासिल की।
करीब तीन साल से वह कॉलेज में कार्यरत हैं और छात्रों को पढ़ा रहे थे। लेकिन अब SOG जांच में यह खुलासा होने के बाद उन पर कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है।
सवाई सिंह गुर्जर का पक्ष
इस पूरे मामले में खुद सवाई सिंह का कहना है कि उन्होंने किसी तरह की धोखाधड़ी नहीं की। उनका दावा है कि 2018 में करौली मेडिकल बोर्ड ने उनकी कान की बीमारी (हियरिंग डिसेबिलिटी) के आधार पर ऑफलाइन मेडिकल सर्टिफिकेट जारी किया था। लेकिन जब इस सर्टिफिकेट को ऑनलाइन अपलोड किया गया तो लिपिकीय त्रुटि के कारण उसमें ‘DEAF & MUTE’ दर्ज हो गया।
सवाई सिंह का कहना है कि उन्होंने हमेशा खुद को केवल हियरिंग इमपेयरमेंट (श्रवण दिव्यांग) श्रेणी में ही माना है और उसी के आधार पर नौकरी हासिल की। यह गलती पूरी तरह से तकनीकी थी, जिसे उन्होंने जानबूझकर नहीं किया। उनका कहना है कि जब इस त्रुटि का पता चला, तब तक नौकरी की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। लेकिन अब SOG ने इस गलती को फर्जीवाड़ा मानते हुए उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया है।
पिछली सरकार की भर्तियों पर उठे सवाल
राजस्थान में पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान दिव्यांगता कोटे से कई भर्तियां की गई थीं। अब जब SOG इन मामलों की जांच कर रही है, तो लगातार चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। कई अभ्यर्थियों ने फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर नौकरी हासिल की, जिससे वास्तव में दिव्यांग अभ्यर्थियों का हक छिन गया।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें अभ्यर्थियों ने मेडिकल बोर्ड की मिलीभगत से या फिर तकनीकी त्रुटियों का फायदा उठाकर अपने प्रमाणपत्र गलत श्रेणी में बनवाए। SOG की कार्रवाई के चलते अब राज्यभर में कई सरकारी कर्मचारियों की नौकरी खतरे में है।
आगे क्या होगा?
SOG की जांच रिपोर्ट के आधार पर अब शिक्षा विभाग और उच्च शिक्षा निदेशालय को इस पर अंतिम निर्णय लेना होगा। सवाई सिंह गुर्जर को फिलहाल अयोग्य घोषित किया गया है और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा, यदि जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि हो जाती है तो उन पर कानूनी कार्रवाई भी संभव है।


