शोभना शर्मा। राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव नहीं कराने के मामले पर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। हाईकोर्ट में राज्य सरकार द्वारा छात्रसंघ चुनाव आयोजित न करने की बात कहने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने बीजेपी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा कि यह फैसला साबित करता है कि बीजेपी चाहती ही नहीं कि नई पीढ़ी राजनीतिक रूप से जागरूक हो और प्रदेश में नया नेतृत्व तैयार हो।
गहलोत ने अपने बयान में कहा, “हाईकोर्ट में राजस्थान की भाजपा सरकार द्वारा छात्रसंघ चुनाव नहीं करवाने की बात कहने से अब यह स्पष्ट है कि भाजपा चाहती ही नहीं कि नई पीढ़ी राजनीतिक रूप से जागृत हो एवं नया नेतृत्व तैयार हो। भाजपा की यह सोच बेहद निंदनीय एवं दुर्भाग्यपूर्ण है।” उन्होंने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ करार देते हुए कहा कि युवाओं के अधिकारों को सीमित करना भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।
ABVP की चुप्पी पर सवाल
अशोक गहलोत ने भारतीय जनता पार्टी से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की चुप्पी पर भी सवाल उठाया। उन्होंने लिखा, “छात्रसंघ की राजनीति केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा एवं अन्य राजनीतिक दलों के भी कई नेता निकल कर आए हैं। क्या उन्हें सार्वजनिक तौर पर अपनी बात नहीं रखनी चाहिए? आखिर नई शिक्षा नीति का बहाना लेकर कब तक इन चुनावों को टालते रहेंगे? RSS का छात्र संगठन ABVP मौन क्यों है? बाकी दलों के छात्र संगठनों को भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखनी चाहिए।”
गहलोत का यह बयान उस समय आया है जब राज्य में छात्र राजनीति को लेकर पहले से ही असंतोष का माहौल है। बीते कई वर्षों से छात्रसंघ चुनाव को लेकर या तो तारीखें टाली जाती रही हैं या चुनाव रद्द कर दिए जाते रहे हैं।
याचिका से शुरू हुआ मामला
इस विवाद की शुरुआत 24 जुलाई 2025 को हुई, जब राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्र जय राव ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग की। याचिका में कहा गया कि छात्रसंघ चुनाव छात्रों का मौलिक अधिकार है और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके तहत छात्र अपने प्रतिनिधियों का चुनाव कर विश्वविद्यालय के कामकाज में भागीदारी करते हैं।
याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि फिलहाल चुनाव कराना संभव नहीं है। सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) लागू करने का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा शैक्षणिक सत्र और शैक्षणिक गतिविधियों को देखते हुए चुनाव आयोजित करना व्यावहारिक नहीं है।
लिंगदोह कमेटी की सिफारिश का हवाला
सरकार ने अपने जवाब में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का भी उल्लेख किया। इस सिफारिश के अनुसार, किसी भी शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के आठ सप्ताह के भीतर छात्रसंघ चुनाव कराए जाने चाहिए। सरकार का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में यह समयसीमा पूरी करना संभव नहीं है। इसके साथ ही, सरकार ने कई विश्वविद्यालयों के कुलगुरुओं की राय भी अदालत के सामने पेश की, जिनमें चुनाव टालने की सिफारिश की गई है। कुलगुरुओं ने तर्क दिया कि वर्तमान में कक्षाओं का कार्यक्रम और सत्र का समय चुनाव आयोजन के अनुकूल नहीं है।
राजनीतिक और शैक्षणिक असर
छात्रसंघ चुनाव रद्द होने से न केवल छात्रों में नाराजगी है, बल्कि राजनीतिक माहौल भी गरमा गया है। कांग्रेस इस मुद्दे को लोकतंत्र और युवा नेतृत्व के भविष्य से जोड़कर देख रही है, जबकि बीजेपी सरकार प्रशासनिक और शैक्षणिक कारणों का हवाला देकर अपने फैसले का बचाव कर रही है।
गहलोत का आरोप है कि चुनाव न कराने से युवा नेताओं के उभरने का रास्ता बंद हो जाएगा और छात्र राजनीति कमजोर पड़ेगी। वहीं, सरकार का तर्क है कि वर्तमान में शैक्षणिक गतिविधियों को प्राथमिकता देना आवश्यक है और चुनाव के कारण पढ़ाई में बाधा नहीं आनी चाहिए।
राजस्थान की छात्र राजनीति का इतिहास बेहद सक्रिय और प्रभावशाली रहा है। राज्य के कई बड़े नेता—चाहे वे कांग्रेस से हों या बीजेपी से—छात्र राजनीति से ही उभरकर मुख्यधारा की राजनीति में आए हैं। ऐसे में चुनाव न होना भविष्य की राजनीति पर भी असर डाल सकता है।


