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रामगढ़ बांध भरने के लिए क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट शुरू

रामगढ़ बांध भरने के लिए क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट शुरू

शोभना शर्मा।  राजस्थान के जयपुर जिले में जल संकट से निपटने और रामगढ़ बांध को भरने के लिए एक ऐतिहासिक और तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। 12 अगस्त से यहां प्रिसिजन बेस्ड आर्टिफिशियल रेन प्रोजेक्ट की शुरुआत होने की संभावना है। यह भारत में पहला अवसर होगा जब ड्रोन तकनीक के माध्यम से क्लाउड सीडिंग के जरिए इतनी सटीकता के साथ कृत्रिम बारिश करवाई जाएगी।

क्यों हो रही है यह पहल?

रामगढ़ बांध जयपुर के लिए जल आपूर्ति का एक प्रमुख स्रोत है, लेकिन कई वर्षों से इसका जलस्तर चिंताजनक रूप से कम है। मानसून की अनियमितता और वर्षा की कमी के कारण पानी की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। इस स्थिति में क्लाउड सीडिंग तकनीक को अपनाकर जलस्तर बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

क्लाउड सीडिंग और ड्रोन का मेल

इस प्रोजेक्ट में ड्रोन का इस्तेमाल करके बादलों में सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या ड्राई आइस जैसे रसायन छोड़े जाएंगे। ये रसायन बादलों में जाकर जल की सूक्ष्म बूंदों के चारों ओर जमाव करते हैं। समय के साथ ये बूंदें भारी होकर बारिश के रूप में गिरती हैं।
अब तक भारत में क्लाउड सीडिंग के लिए हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर का उपयोग किया जाता था, लेकिन जयपुर में पहली बार ड्रोन का इस्तेमाल होगा। ड्रोन की खासियत यह है कि यह लोकेशन के हिसाब से बेहद सटीक लक्ष्य तय करके रसायन का छिड़काव कर सकता है।

अमेरिकी वैज्ञानिक और AI तकनीक

इस प्रोजेक्ट में अमेरिकी वैज्ञानिकों की एक टीम भी शामिल है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए बादलों के मूवमेंट, तापमान, नमी और हवा की दिशा का डेटा कैलकुलेट करेगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि रसायन का छिड़काव सही समय और सही स्थान पर हो। भारत में अब तक क्लाउड सीडिंग बड़े पैमाने पर की जाती रही है, लेकिन इस बार एक खास लोकेशन — रामगढ़ बांध — को चुनकर प्रिसिजन लेवल पर काम किया जाएगा।

प्रोजेक्ट की समयसीमा और चुनौतियां

प्रोजेक्ट के 12 अगस्त से शुरू होकर लगभग एक महीने से अधिक समय तक चलने की संभावना है। पहले यह 30 जुलाई से शुरू होना था, लेकिन मौसम की खराबी के कारण इसे स्थगित कर दिया गया। क्लाउड सीडिंग तभी सफल होती है जब वातावरण में पर्याप्त बादल और नमी मौजूद हो। यही कारण है कि मौसम की स्थिति पर नजर रखना बेहद जरूरी है।

देश में और कहाँ हुआ है प्रयोग?

भारत में क्लाउड सीडिंग की शुरुआत 1951 में हुई थी, जब टाटा फर्म ने केरल के पश्चिमी घाट में हवाई जहाज के जरिए यह तकनीक अपनाई। हाल के वर्षों में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और दिल्ली में भी इस तकनीक का इस्तेमाल सूखा कम करने और वायु प्रदूषण घटाने के लिए किया गया है।
दिल्ली सरकार ने भी जुलाई 2025 में कृत्रिम बारिश करवाने का प्लान बनाया था, लेकिन अनुकूल बादल न होने के कारण यह योजना टाल दी गई। अब यह 30 अगस्त से 10 सितंबर के बीच होने की संभावना है।

मिडिल ईस्ट का अनुभव

मिडिल ईस्ट के देशों, खासकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में, क्लाउड सीडिंग का व्यापक रूप से उपयोग होता रहा है। अप्रैल 2024 में दुबई में विमानों के जरिए आर्टिफिशियल रेन की गई, लेकिन इस दौरान इतनी अधिक बारिश हुई कि बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, 16 अप्रैल 2024 को कुछ ही घंटों में इतनी बारिश हुई जितनी वहां डेढ़ साल में होती है। इससे सड़कों, कॉलेजों और यहां तक कि एयरपोर्ट के रनवे पर भी पानी भर गया था।

संभावित फायदे

यदि जयपुर का यह पायलट प्रोजेक्ट सफल होता है, तो यह न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है।

  • जल संकट से जूझ रहे इलाकों में पानी की आपूर्ति सुधरेगी।

  • खेती के लिए सिंचाई की सुविधा बढ़ेगी।

  • भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद मिलेगी।

  • सूखे की समस्या कम हो सकती है।

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