शोभना शर्मा। राजस्थान की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने चार महत्वपूर्ण कानूनों को लागू कर दिया है। इन कानूनों को विधानसभा से पारित कराने के बाद राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े की मंजूरी भी प्राप्त हो गई है और अब ये विधिवत रूप से राज्य में लागू हो गए हैं। इन फैसलों से न सिर्फ राज्य की नीतिगत दिशा स्पष्ट होती है, बल्कि यह भी झलकता है कि भाजपा अपने वैचारिक एजेंडे के अनुरूप राज्य को आगे ले जाना चाहती है।
मीसा बंदियों को मिलेगा पेंशन और चिकित्सा भत्ता
राजस्थान लोकतंत्र सेनानी सम्मान विधेयक 2024 के तहत अब आपातकाल के समय मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत जेल गए लोगों को ‘लोकतंत्र रक्षक’ का दर्जा दिया गया है। भजनलाल सरकार ने इस वर्ग के लिए पेंशन योजना को कानूनी जामा पहनाया है। अब ऐसे सभी मीसा बंदियों को ₹20,000 प्रति माह पेंशन दी जाएगी। इसके अलावा ₹4,000 मासिक चिकित्सा भत्ता भी मिलेगा। इतना ही नहीं, रोडवेज की बसों में निशुल्क यात्रा की सुविधा और मृत्यु उपरांत जीवनसाथी को भी ये सुविधाएं जीवनपर्यंत मिलती रहेंगी। इस विधेयक के माध्यम से भाजपा ने अपने समर्थकों को एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक आधार देने की कोशिश की है।
अनुपयोगी कानूनों का हुआ निरसन
राजस्थान विधियां निरसन अधिनियम 2025 के माध्यम से सरकार ने कुल 45 पुराने, अनुपयोगी कानूनों को समाप्त कर दिया है। ये कानून मुख्यतः पंचायती राज विभाग से संबंधित थे, जिनकी आज के संदर्भ में कोई उपयोगिता नहीं रह गई थी। पुराने कानूनों की सफाई से राज्य की प्रशासनिक प्रक्रिया अधिक सरल और आधुनिक बन सकेगी। इससे आने वाले समय में नीतिगत कार्यों में स्पष्टता और गति मिलने की संभावना है।
कुलपति अब कहलाएंगे ‘कुलगुरु’
राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय प्रणाली में भी एक अहम बदलाव किया है। राजस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन करते हुए अब ‘कुलपति’ (Vice Chancellor) को ‘कुलगुरु’ कहा जाएगा। यद्यपि अंग्रेजी में पदनाम अब भी ‘Vice Chancellor’ ही रहेगा, लेकिन हिंदी में इस बदलाव के पीछे सरकार की भावना भारतीय परंपराओं को महत्व देने की है। यह कदम भारतीय संस्कृति आधारित शैक्षणिक ढांचे को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक पहल माना जा रहा है।
स्थानीय निकायों में जजों की नियुक्ति पर रोक
राजस्थान विधियां संशोधन अधिनियम-2025 के अंतर्गत अब स्थानीय निकायों, नगर सुधार न्यास और प्राधिकरणों में न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं की जाएगी। सरकार का मानना है कि स्थानीय स्तर पर ऐसे पदों की कोई जरूरत नहीं है और इससे प्रशासनिक प्रक्रिया पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम निर्णय के बाद लिया गया है। सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि इस निर्णय से किसी भी निकाय की कार्यक्षमता या अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।


