शोभना शर्मा, अजमेर। वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को लेकर देशभर में विवाद बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में दरगाह शरीफ अजमेर के खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद ज़ादगान खुद्दामे ख्वाजा साहब ने इस कानून के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। संस्था के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने एक प्रेस वार्ता में इस अधिनियम को मुसलमानों को निशाना बनाने की “सुनियोजित साजिश” बताया और इसका स्पष्ट विरोध जताया।
प्रेस वार्ता में चिश्ती ने कहा कि यह कानून मुसलमानों की धार्मिक संपत्तियों और अधिकारों पर सीधा हमला है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में हिंदुओं, सिखों और जैन समुदायों के लिए अलग-अलग प्रबंधन बोर्ड हैं, तो फिर मुसलमानों के वक्फ बोर्ड में गैर-मुसलमानों को शामिल करने की क्या जरूरत है? उन्होंने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 26 और 29 का स्पष्ट उल्लंघन है।
चिश्ती ने आरोप लगाया कि सरकार का इरादा वक्फ संपत्तियों पर कब्जा जमाना है। उन्होंने कहा, “वक्फ बाय यूज़र” को खत्म कर दिया गया है और सीमितता अधिनियम के जरिए किराएदारों को मालिक बनाने का रास्ता खोला जा रहा है। यह न केवल मुस्लिम समुदाय के हितों के खिलाफ है, बल्कि उनके धार्मिक और सांस्कृतिक अस्तित्व पर भी खतरा है। उन्होंने सरकार पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि यह कानून बीजेपी के सांप्रदायिक एजेंडे का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “जब संसद में यह अधिनियम पारित हुआ, तो ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए गए, जो इस कानून की मंशा को उजागर करता है।”
चिश्ती ने यह भी कहा कि कुछ मुस्लिम संगठन और व्यक्ति सरकार की चापलूसी में इस कानून का समर्थन कर रहे हैं, जो पूरे मुस्लिम समाज के लिए घातक है। उन्होंने कहा कि अंजुमन इस कानून का हर स्तर पर विरोध करेगी और आवश्यकता पड़ी तो आंदोलन भी छेड़ेगी। उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए और कहा कि अब वक्त है कि बोर्ड का रवैया आक्रामक हो—हिंसक नहीं, लेकिन निर्णायक और संगठित हो। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज को सज्जादानशीन, सादात और दरगाहों के प्रभावशाली लोगों से अपेक्षा है कि वे इस संघर्ष में आगे आएं, न कि खामोश बैठे रहें।
चिश्ती ने प्रेस वार्ता के दौरान प्रतीकात्मक रूप से शेरवानी उतार कर एक संदेश दिया कि अब नेतृत्व को बदलने का समय आ गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वक्फ संपत्तियां केवल मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होती हैं और इसमें किसी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस कानून पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए और संविधान पीठ से इसकी समीक्षा करानी चाहिए। उन्होंने 1935 की वक्फ जेपीसी (काजमी बिल) को याद करते हुए बताया कि अंजुमन ने तब भी इसका विरोध किया था, और 2002 की जेपीसी फॉर वक्फ में भाग लेकर अपनी राय रखी थी। अगस्त 2024 में लाया गया वक्फ बिल भी अंजुमन ने प्रेस वार्ता कर अस्वीकार कर दिया था। उन्होंने कहा, “यह लड़ाई लंबी होगी, लेकिन संयम और रणनीति से हमें इसे जीतना होगा। किसान आंदोलन की तरह, मुस्लिम समुदाय को भी एकजुट होकर लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करना होगा।”
अंत में, उन्होंने कहा कि अंजुमन संविधान और लोकतंत्र में पूरा विश्वास रखती है, लेकिन अन्याय को चुपचाप सहना उनके इतिहास में कभी नहीं रहा। “हम अली (अ.स.) की बहादुरी और हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी के अनुयायी हैं, अन्याय के खिलाफ खड़े होना हमारे खून में है,” उन्होंने गर्व से कहा। इस प्रेस वार्ता में अंजुमन के सदर गुलाम किबरिया सहित संस्था के अन्य वरिष्ठ सदस्य भी मौजूद रहे, जिन्होंने एक स्वर में अधिनियम का विरोध कर, सरकार को चेताया कि मुस्लिम समुदाय अब चुप नहीं बैठेगा।


