शोभना शर्मा। अंटार्कटिका, जो सदियों से एक बर्फीला और वीरान महाद्वीप माना जाता था, अब वैश्विक शक्तियों के लिए प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया है। बर्फ से ढंके इस क्षेत्र में विशाल तेल, प्राकृतिक गैस और खनिज भंडार छिपे हुए हैं, जिनके दोहन की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। इन संसाधनों पर कब्जा जमाने की होड़ में रूस, चीन और ईरान जैसे देश तेजी से अपनी रणनीतियां बना रहे हैं। यह स्थिति न केवल 1959 की अंटार्कटिक संधि को चुनौती दे रही है, बल्कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन को भी गति दे रही है।
अंटार्कटिका का सामरिक महत्व
इतिहास में अंटार्कटिका को पहली बार 1820 में खोजा गया था। उस समय यह एक निर्जन और अछूता बर्फीला क्षेत्र था। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस महाद्वीप का सामरिक महत्व सामने आया। 1941 में जर्मन पनडुब्बियों ने अंटार्कटिका के जलक्षेत्र में घुसपैठ करके नॉर्वे के जहाजों को कब्जे में लिया और उनकी बेशकीमती सामग्री का उपयोग विस्फोटकों के निर्माण में किया। यह घटना दिखाती है कि अंटार्कटिका जैसे क्षेत्र का उपयोग वैश्विक सैन्य रणनीतियों में कैसे किया जा सकता है।
शीत युद्ध के समय भी यह क्षेत्र रूस और अमेरिका के बीच टकराव का एक प्रमुख बिंदु बन गया। रूस की शक्तिशाली नौसेना और अमेरिका के ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे सहयोगी देशों ने इसे एक अंतरराष्ट्रीय विवाद का रूप दिया। इस संघर्ष को रोकने के लिए 1959 में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ जिसे “अंटार्कटिक संधि” कहा जाता है।
1959 की अंटार्कटिक संधि और इसके उद्देश्य
1959 की अंटार्कटिक संधि का मुख्य उद्देश्य महाद्वीप पर शांति बनाए रखना और इसे वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सुरक्षित रखना था। इसके तहत अंटार्कटिका को सैन्य गतिविधियों, हथियारों के परीक्षण और परमाणु विस्फोटों से मुक्त रखा गया।
संधि के प्रमुख प्रावधान:
शांतिपूर्ण उपयोग: अंटार्कटिका का उपयोग केवल वैज्ञानिक अनुसंधान और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।
सैन्य गतिविधियों पर रोक: युद्धाभ्यास, सैन्य ठिकानों और हथियारों के उपयोग पर सख्त प्रतिबंध।
वैज्ञानिक सहयोग: सभी सदस्य देशों को अनुसंधान से संबंधित जानकारी साझा करनी होगी।
परमाणु प्रतिबंध: परमाणु विस्फोट और रेडियोधर्मी कचरे के निपटान पर पूर्ण प्रतिबंध।
अंटार्कटिका पर कब्जे की होड़: रूस, चीन और ईरान की भूमिका
ईरान का दावा और सैन्य उपस्थिति
फरवरी 2024 में ईरान ने अंटार्कटिका में एक स्थायी बेस स्थापित करने की घोषणा की। ईरानी नौसेना ने इस क्षेत्र पर “संपत्ति अधिकार” का दावा करते हुए वैज्ञानिक और सैन्य गतिविधियां शुरू करने की योजना बनाई है। चूंकि ईरान अंटार्कटिक संधि पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए उसकी गतिविधियां संधि के उल्लंघन का संकेत देती हैं।
रूस का विस्तारवादी कदम
रूस ने मई 2024 में यूके के अधिकार क्षेत्र वाले हिस्से में बड़े तेल और गैस भंडार की खोज की। रूस ने इन संसाधनों का व्यावसायिक रूप से दोहन करने की योजना बनाई है, जो अंटार्कटिक संधि के प्रावधानों को सीधी चुनौती है।
चीन का बढ़ता प्रभाव
चीन ने अंटार्कटिका में अपने पांचवें अनुसंधान स्टेशन की स्थापना के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है। नवंबर 2023 में चीन ने लगभग 500 कर्मियों के साथ अपना अब तक का सबसे बड़ा अंटार्कटिक अभियान शुरू किया।
क्यों बढ़ रही है अंटार्कटिका की ओर दिलचस्पी?
अंटार्कटिका के बर्फीले विस्तार के नीचे भारी मात्रा में प्राकृतिक संसाधन छिपे हैं।
- तेल और गैस भंडार: अनुमान है कि अंटार्कटिका में लगभग 511 बिलियन बैरल तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं।
- खनिज भंडार: सोना, तांबा और अन्य दुर्लभ खनिजों के भंडार।
- समुद्री संसाधन: अंटार्कटिक महासागर में मछलियों और क्रिल का भरपूर भंडार है, जो वैश्विक खाद्य आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इन संसाधनों पर कब्जा जमाने के लिए कई देश संधि के नियमों को दरकिनार कर अपने दावे पेश कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन और अंटार्कटिका
जलवायु परिवर्तन ने अंटार्कटिका को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। यहां का बर्फ तेजी से पिघल रहा है, जिससे समुद्री स्तर बढ़ रहा है। इसके अलावा, बर्फ के पिघलने से यहां छिपे संसाधनों तक पहुंच आसान हो रही है, जो इसे और अधिक आकर्षक बना रहा है।
अंटार्कटिका पर कब्जे की होड़ न केवल वैश्विक शक्तियों के बीच तनाव को बढ़ा रही है, बल्कि 1959 की अंटार्कटिक संधि की वैधता को भी खतरे में डाल रही है। रूस, चीन और ईरान जैसे देशों की बढ़ती गतिविधियां इस क्षेत्र को भू-राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बना सकती हैं। शांति और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए समर्पित इस महाद्वीप को बचाने के लिए वैश्विक स्तर पर नए सिरे से चर्चा और सहयोग की आवश्यकता है। यदि समय रहते इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया गया, तो अंटार्कटिका भी अन्य विवादित क्षेत्रों की तरह संघर्ष का अखाड़ा बन सकता है।


