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अजमेर दरगाह विवाद: क्या ख्वाजा साहब की दरगाह में था शिव मंदिर?

अजमेर दरगाह विवाद: क्या ख्वाजा साहब की दरगाह में था शिव मंदिर?

मनीषा शर्मा, अजमेर। राजस्थान के अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भारत में एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। लेकिन हाल ही में यह दरगाह एक विवाद के केंद्र में आ गई है। हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से दायर याचिका में दावा किया गया है कि दरगाह का निर्माण एक प्राचीन शिव मंदिर के अवशेषों पर हुआ है।

याचिका का दावा

38 पेज की इस याचिका में बताया गया है कि ख्वाजा साहब की दरगाह के परिसर में एक शिव मंदिर था। इसके निर्माण में मंदिर के मलबे का उपयोग किया गया। याचिका में ब्रिटिश काल के रिटायर्ड जज हरविलास शारदा की 1911 में प्रकाशित किताब “अजमेर: हिस्टॉरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव” का हवाला दिया गया है।

इस किताब में दावा किया गया है कि:

  1. बुलंद दरवाजा: इसकी नक्काशी में हिंदू परंपरा की झलक मिलती है।
  2. गर्भगृह या तहखाना: इसमें शिवलिंग होने की बात कही गई है।
  3. परिसर में मंदिर का मलबा: निर्माण के लिए मंदिर के अवशेषों का उपयोग हुआ।

याचिका में क्या मांग की गई है?

हिंदू सेना की याचिका में निम्नलिखित मांगें रखी गई हैं:

  • ASI से सर्वेक्षण: परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जाए।
  • मंदिर में पूजा का अधिकार: परिसर में हिंदू श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना की अनुमति दी जाए।
  • अवैध निर्माण को हटाया जाए: दरगाह कमेटी द्वारा किए गए किसी भी अवैध निर्माण को हटाया जाए।

हिंदू सेना का तर्क

हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता का कहना है कि दरगाह के आसपास के क्षेत्र में हिंदू स्थापत्य कला की झलक मिलती है। उन्होंने बुलंद दरवाजे पर बनी नक्काशी और परिसर में पानी के झरने का उल्लेख करते हुए इसे शिव मंदिर होने का प्रमाण बताया।

दरगाह कमेटी का जवाब

दरगाह कमेटी ने इन दावों को पूरी तरह झूठा और निराधार बताया है।

  1. नसरुद्दीन चिश्ती का बयान: दरगाह प्रमुख उत्तराधिकारी नसरुद्दीन चिश्ती ने कहा कि यह विवाद सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए उठाया गया है।
  2. 1950 की रिपोर्ट का हवाला: उन्होंने कहा कि 1950 में जस्टिस गुलाम हसन की कमेटी ने दरगाह की पूरी जांच की थी और इसे किसी अन्य धर्मस्थल के अवशेष पर निर्मित नहीं माना था।
  3. देश की एकता पर खतरा: अंजुमन कमेटी के सचिव सरवर चिश्ती ने इस विवाद को देश की एकता और सहिष्णुता के लिए खतरनाक बताया।

विवाद के ऐतिहासिक और कानूनी पहलू

1. हरविलास शारदा की किताब

रिटायर्ड जज हरविलास शारदा की किताब में दरगाह के निर्माण से जुड़े विवादों का जिक्र मिलता है। उन्होंने बुलंद दरवाजे की संरचना और तहखाने में शिवलिंग होने का दावा किया था। हालांकि, यह सिर्फ एक ऐतिहासिक संदर्भ है, जिसे कोर्ट में सत्यापित किया जाना बाकी है।

2. 1991 का प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट

सरवर चिश्ती और अन्य मुस्लिम संगठनों ने प्लेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजन्स) एक्ट, 1991 का हवाला दिया। इस कानून के तहत बाबरी मस्जिद विवाद को छोड़कर किसी भी अन्य धार्मिक स्थल के चरित्र में बदलाव नहीं किया जा सकता।

3. हिंदू-मुस्लिम संबंधों का इतिहास

अजमेर दरगाह का इतिहास दोनों समुदायों के बीच आपसी सम्मान का प्रतीक है। जयपुर के महाराज सहित कई हिंदू राजाओं ने दरगाह में अपनी श्रद्धा व्यक्त की थी।

दरगाह का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए भी महत्वपूर्ण है। उनकी शिक्षाओं ने हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को जोड़ने का काम किया।

  • धार्मिक आस्था का केंद्र: दरगाह पर हर साल उर्स के समय लाखों लोग आते हैं।
  • संस्कृति का प्रतीक: दरगाह में हिंदू-मुस्लिम दोनों की परंपराओं की झलक मिलती है।

आगे की कानूनी प्रक्रिया

अजमेर सिविल कोर्ट ने मामले को सुनवाई योग्य माना है और अल्पसंख्यक मंत्रालय, दरगाह कमेटी और ASI को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 20 दिसंबर को होगी। यह विवाद एक संवेदनशील मुद्दा है, जो धार्मिक, कानूनी और सांस्कृतिक पहलुओं को छूता है। जहां एक ओर हिंदू सेना इस मामले को ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर उठाने की बात कर रही है, वहीं दरगाह कमेटी और मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह देश की एकता और शांति को खतरे में डाल सकता है।

 

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