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भजनलाल सरकार भर्ती परीक्षाओं में फिर से शुल्क लेने की तैयारी

भजनलाल सरकार भर्ती परीक्षाओं में फिर से शुल्क लेने की तैयारी

मनीषा शर्मा।  राजस्थान में सत्ता बदलने के बाद गहलोत सरकार के कई फैसलों को रद्द या बदला जा चुका है। अब भजनलाल सरकार ने एक और बड़ा फैसला बदलने की तैयारी कर ली है। यह बदलाव सीधे प्रदेश के युवाओं से जुड़ा है।
गहलोत सरकार ने प्रदेश के बेरोजगार युवाओं को राहत देते हुए भर्ती परीक्षाओं के लिए बार-बार आवेदन शुल्क जमा करने की व्यवस्था खत्म कर दी थी। एक बार रजिस्ट्रेशन के बाद अभ्यर्थियों को अलग-अलग परीक्षाओं के लिए शुल्क नहीं देना पड़ता था।

हालांकि, भजनलाल सरकार अब इस व्यवस्था को रद्द कर फिर से भर्ती परीक्षाओं में शुल्क वसूली की तैयारी कर रही है।

भर्ती परीक्षाओं में शुल्क लेने की वजह

राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड ने हाल ही में सरकार को एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें भर्ती परीक्षाओं के लिए आवेदन शुल्क को फिर से लागू करने की बात कही गई है।

बोर्ड के अध्यक्ष मेजर आलोक राज का कहना है कि:

  • कई अभ्यर्थी सिर्फ फॉर्म भर देते हैं लेकिन परीक्षा देने नहीं आते।
  • इससे सरकार के पैसे और संसाधनों का अपव्यय होता है।
  • शुल्क लेने से इस स्थिति पर अंकुश लगाया जा सकता है।

प्रस्तावित आवेदन शुल्क

  • सामान्य वर्ग: 300 रुपये
  • आरक्षित वर्ग: 200 रुपये
  • दिव्यांग अभ्यर्थी: 200 रुपये

भर्ती परीक्षाओं में उपस्थिति प्रतिशत की स्थिति

राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड की कई भर्ती परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की उपस्थिति बेहद कम रही है। नीचे दिए गए आंकड़े बताते हैं कि किस तरह से फॉर्म भरने वाले उम्मीदवारों में से अधिकांश परीक्षा देने नहीं पहुंचे:

भर्ती का नामकुल अभ्यर्थीउपस्थितिउपस्थिति प्रतिशत
कनिष्ठ अनुदेशक भर्ती (मैके. डीजल)11086458.21%
स्टेनोग्राफर भर्ती परीक्षा1668844688028.09%
प्रोग्रामर भर्ती परीक्षा720732602936.11%
सहायक सांख्यिकी अधिकारी13290200415.07%
पुरा लेखपाल170619111.19%
कॉलेज शिक्षक650002500038.46%

यह आंकड़े बताते हैं कि परीक्षा में उपस्थित होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या बहुत कम है। बोर्ड का मानना है कि शुल्क लगाने से यह संख्या बढ़ सकती है।

सोशल मीडिया पर विरोध का दौर

जब राजस्थान कर्मचारी चयन आयोग के सचिव भागचंद बधाल ने ट्वीट करके परीक्षा शुल्क लेने का सुझाव दिया, तो बेरोजगार युवाओं ने इसका कड़ा विरोध किया।
सचिव ने ट्वीट में लिखा था:

“फॉर्म भरकर परीक्षा में नहीं बैठने से आमजन के पैसे और संसाधनों का अपव्यय होता है। इसलिए परीक्षा शुल्क लेने का निर्णय लिया गया है।”

इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर युवाओं ने सरकार के इस कदम के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। विरोध बढ़ने पर सचिव ने ट्वीट डिलीट कर दिया, लेकिन इसका स्क्रीनशॉट अभी भी वायरल हो रहा है।

युवाओं के तर्क: क्यों न लिया जाए परीक्षा शुल्क?

  1. आर्थिक बोझ:
    • बेरोजगार युवा पहले से ही वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं।
    • बार-बार शुल्क देना उनके लिए भारी पड़ सकता है।
  2. सिस्टम का दोष:
    • कई बार परीक्षाएं रद्द हो जाती हैं या लंबे समय तक टल जाती हैं।
    • इसके लिए अभ्यर्थियों को जिम्मेदार ठहराना गलत है।
  3. योग्य अभ्यर्थियों को प्रभावित करेगा:
    • शुल्क बढ़ने से कई योग्य अभ्यर्थी आर्थिक तंगी के कारण आवेदन नहीं कर पाएंगे।

सरकार का पक्ष

सरकार का मानना है कि शुल्क लगाने से:

  • परीक्षा देने वाले गंभीर उम्मीदवारों की संख्या बढ़ेगी।
  • फर्जी और अनावश्यक आवेदन रुकेंगे।
  • संसाधनों का सही उपयोग होगा।

हालांकि, इस प्रस्ताव पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

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