मनीषा शर्मा। जयपुर के विद्याधर नगर स्टेडियम में चल रही रामकथा में जगद्गुरु रामभद्राचार्य (Jagadguru Rambhadracharya) ने कई मुद्दों पर अपने विचार रखे। रामभद्राचार्य ने कहा कि “देश की चिंता एक संत ही कर सकता है, परिवार वाले भक्त नहीं।” उन्होंने अपने भाषण में गौ-हत्या बंद करवाने, मथुरा-काशी के पुनर्स्थापन, और हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने का संकल्प लिया।
रामभद्राचार्य ने स्पष्ट किया कि आगामी कुंभ में वह एक बड़े सांस्कृतिक आंदोलन का आह्वान करेंगे, जिससे पूरे विश्व के नक्शे से पाकिस्तान का नाम समाप्त हो सके। इसके अलावा उन्होंने 6 दिसंबर को चित्रकूट में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की योजना भी साझा की। उनका कहना है कि देश में सनातनी संस्कृति को पुनः स्थापित करने का समय आ गया है।
गौ-हत्या पर प्रतिबंध और हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा:
रामभद्राचार्य ने गौ-हत्या पर सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि “भारत में गौ-हत्या अब नहीं चलने दी जाएगी।” उन्होंने अपने इस संकल्प को बार-बार दोहराया कि सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुरूप ही भारत की संस्कृति को संजोया जाएगा। साथ ही उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चौथी बार प्रधानमंत्री बनने की इच्छा भी जताई। उनका कहना है कि “देश में हम सत्ता परिवर्तन नहीं चाहते हैं।”
कुंभ में सांस्कृतिक आंदोलन का आह्वान:
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने कहा कि इस बार कुंभ में ऐसा कुछ किया जाएगा, जिससे विश्व के नक्शे पर पाकिस्तान का नामो-निशान मिट जाएगा। यह वक्तव्य देते हुए उन्होंने संतों की भूमिका और जिम्मेदारी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि “देश में व्याप्त समस्याओं का समाधान संतों के मार्गदर्शन से ही संभव है।”
मथुरा-काशी और ज्ञानवापी पुनर्स्थापन का संकल्प:
रामभद्राचार्य ने राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट में दिए गए अपने ऐतिहासिक वक्तव्य का भी जिक्र किया और कहा कि “जब हम रामलला को पुनः स्थापित कर सकते हैं, तो मथुरा-काशी के ज्ञानवापी को भी ला सकते हैं।” उन्होंने रेवासा पीठ की दुर्दशा पर दुःख जताया और कहा कि “सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए संत समाज को आगे आना चाहिए।”
भगवान राम के आदर्शों का उल्लेख:
रामभद्राचार्य ने राम कथा के दौरान भगवान राम के जीवन के आदर्शों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने ताड़का वध और राम विवाह की लीला का वर्णन करते हुए कहा कि “भगवान राम ने कहा था कि संतों को मारने वाले को मारना मेरा धर्म है।” उन्होंने राम के राज्य को आदर्श राज्य का उदाहरण बताते हुए कहा कि “राम जैसा कोई राजा, त्यागी, स्वामी और दानी नहीं है।”
रामभद्राचार्य का जयपुर से लगाव और सालाना यात्रा का वचन:
रामभद्राचार्य ने जयपुर के प्रति अपने लगाव का भी इजहार किया। उन्होंने बताया कि वह पिछली बार 2003 में जयपुर आए थे, और उसके बाद 21 वर्षों तक नहीं आ सके। उन्होंने खेद जताते हुए कहा कि अब वे हर साल जयपुर, जिसे छोटी काशी भी कहा जाता है, की यात्रा करेंगे।
राम जन्मभूमि मामले में रामभद्राचार्य का ऐतिहासिक योगदान:
राम जन्मभूमि आंदोलन में भी जगद्गुरु रामभद्राचार्य की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। जब वह श्रीराम जन्मभूमि के पक्ष में शीर्ष अदालत में उपस्थित हुए थे, तो उन्होंने वेदों और पुराणों के उदाहरण देकर राम जन्मभूमि के सटीक स्थान का उल्लेख किया। जैमिनीय संहिता का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि सरयू नदी के एक स्थान विशेष से राम जन्मभूमि की दिशा और दूरी का सटीक विवरण मिलता है। अदालत ने उनके द्वारा दिए गए प्रमाण को प्रमाणिक माना, और उनके वक्तव्य का असर फैसले के रुख पर पड़ा।
जज ने भी कहा कि “आज मैंने सनातनी प्रज्ञा का चमत्कार देखा है। एक ऐसा व्यक्ति, जिसकी आँखें भौतिक रूप से देखने में असमर्थ हैं, भारतीय वांग्मय और वेद-पुराणों के उद्धरण दे रहा है।” यह बयान रामभद्राचार्य की अद्भुत स्मरणशक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रमाण है।
2 महीने की उम्र में खोई दृष्टि, फिर भी 22 भाषाओं का ज्ञान:
जगद्गुरु रामभद्राचार्य बचपन से ही दृष्टिहीन हैं। मात्र दो महीने की उम्र में उनकी आँखों की रोशनी चली गई थी। इसके बावजूद उन्हें 22 भाषाओं का ज्ञान है और वह 80 से अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके हैं। न तो वे पढ़ सकते हैं, न लिख सकते हैं, और न ही ब्रेल लिपि का उपयोग करते हैं। वे केवल सुनकर सीखते हैं और अपनी रचनाएँ बोलकर लिखवाते हैं। उनका जीवन यह दर्शाता है कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति के लिए अवरोध नहीं होती, यदि उसके पास दृढ़ संकल्प हो।
चित्रकूट में रामभद्राचार्य के सामाजिक योगदान:
चित्रकूट में स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय का भी श्रेय रामभद्राचार्य को ही जाता है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना विकलांगों को उच्च शिक्षा देने के उद्देश्य से की गई थी, और वह इसके आजीवन कुलाधिपति भी हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने तुलसी पीठ की स्थापना की, जो तुलसीदास के साहित्य और विचारधारा को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए समर्पित है। तुलसीदास पर उनके गहन अध्ययन और शोध के कारण उन्हें भारत में तुलसीदास पर सबसे अच्छे विशेषज्ञों में से एक माना जाता है।


