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भारत के 6 मंदिर जहां विशेष अनुष्ठानों में पुरुषों का प्रवेश वर्जित माना जाता है

भारत के 6 मंदिर जहां विशेष अनुष्ठानों में पुरुषों का प्रवेश वर्जित माना जाता है

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” शास्त्रों में वर्णित यह वाक्य भारतीय संस्कृति में नारी सम्मान की अवधारणा को रेखांकित करता है। आम तौर पर मंदिरों में प्रवेश को लेकर बहस महिलाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों के संदर्भ में होती है, लेकिन भारत में कुछ ऐसे धार्मिक स्थल भी हैं जहां विशेष अवसरों या अनुष्ठानों के दौरान पुरुषों की भूमिका सीमित कर दी जाती है। इन परंपराओं को स्थानीय आस्था, पौराणिक कथाओं और प्रतीकात्मक धार्मिक अर्थों से जोड़ा जाता है।

अट्टुकल भगवती मंदिर

केरल स्थित अट्टुकल भगवती मंदिर को अक्सर “महिलाओं का सबरीमाला” कहा जाता है। यहां आयोजित होने वाला अट्टुकल पोंगल उत्सव विश्व के सबसे बड़े महिला धार्मिक समागमों में गिना जाता है। इस दौरान लाखों महिलाएं देवी को प्रसाद अर्पित करने के लिए एकत्रित होती हैं और पूरा क्षेत्र सामूहिक अनुष्ठान स्थल में परिवर्तित हो जाता है। परंपरा के अनुसार, इस अनुष्ठान के दौरान धार्मिक क्रियाओं में महिलाओं की प्रमुख भूमिका होती है और पुरुष सहभागी नहीं बनते। इसे नारी शक्ति की सामूहिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है।

चक्कुलाथुकावु मंदिर

केरल के अलाप्पुझा जिले में स्थित चक्कुलाथुकावु मंदिर में ‘नारी पूजा’ का विशेष महत्व है। इस अवसर पर महिला भक्तों को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। परंपरा के अनुसार, मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा महिला श्रद्धालुओं के चरण धोने की रस्म निभाई जाती है। इस अनुष्ठान में महिलाओं को केंद्र में रखकर आध्यात्मिक सम्मान प्रदान किया जाता है, जबकि पुरुषों की भूमिका सीमित रहती है।

ब्रह्मा मंदिर पुष्कर

राजस्थान के पुष्कर स्थित ब्रह्मा मंदिर को देश में भगवान ब्रह्मा के प्रमुख मंदिरों में गिना जाता है। यहां सामान्य दर्शन सभी के लिए खुले हैं, लेकिन कुछ पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार विवाहित पुरुषों को विशेष अनुष्ठानों में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाती। यह मान्यता उस पौराणिक कथा से जुड़ी है जिसमें यज्ञ के दौरान माता सरस्वती के क्रोधित होने का उल्लेख मिलता है। सदियों से यह परंपरा स्थानीय रीति-रिवाजों का हिस्सा बनी हुई है।

कामाख्या मंदिर

असम के गुवाहाटी स्थित कामाख्या मंदिर शक्तिपीठों में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां देवी की पूजा प्राकृतिक शिला रूप में की जाती है, जिसे सृजन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अंबुबाची मेले के दौरान मंदिर तीन दिनों के लिए बंद रहता है, जिसे देवी के मासिक धर्म चक्र का प्रतीकात्मक समय माना जाता है। इस अवधि में विशेष अनुष्ठान होते हैं जिनका केंद्र स्त्री सृजन शक्ति की पवित्रता है। हालांकि पुरुषों पर स्थायी प्रतिबंध नहीं है, लेकिन इन अनुष्ठानों की प्रकृति स्त्रीत्व की आध्यात्मिक अवधारणा पर आधारित है।

संतोषी माता मंदिर वृंदावन

वृंदावन स्थित संतोषी माता मंदिर में शुक्रवार व्रत का विशेष महत्व है। कई अवसरों पर धार्मिक अनुष्ठानों में महिलाओं की प्रधानता रहती है और कुछ विशेष दिनों में गर्भगृह में पुरुषों का प्रवेश सीमित किया जाता है। संतोषी माता की पूजा मुख्यतः पारिवारिक सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना से जुड़ी मानी जाती है।

भगवती मंदिर कन्याकुमारी

तमिलनाडु के कुछ भगवती मंदिरों, विशेषकर कन्याकुमारी स्थित भगवती अम्मन मंदिर में देवी को कुंवारी शक्ति के रूप में पूजा जाता है। कुछ विशिष्ट अनुष्ठानों के दौरान पुरुषों का गर्भगृह में प्रवेश सीमित किया जाता है। यह परंपरा देवी की पवित्रता और स्वतंत्र शक्ति के प्रतीकात्मक स्वरूप से जुड़ी मानी जाती है।

इन सभी उदाहरणों में यह समझना आवश्यक है कि ये परंपराएं स्थानीय आस्था और धार्मिक प्रतीकों पर आधारित हैं। इन्हें सामाजिक या कानूनी दृष्टि से सार्वभौमिक नियम नहीं माना जा सकता, बल्कि यह विशिष्ट सांस्कृतिक संदर्भों का हिस्सा हैं।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक स्रोतों पर आधारित है MTTV INDIA यह दी गई जानकारी की सत्यता का दावा नहीं करता। किसी भी आस्था या अनुष्ठान को अपनाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ या अधिकृत स्रोत से परामर्श लेना उचित है।

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