शोभना शर्मा। राजधानी जयपुर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल छह बावड़ियों का स्वरूप अब एक बार फिर से निखरेगा। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने वर्ष 2025-26 के बजट भाषण में जयपुर शहर की बावड़ियों के जीर्णोद्धार की घोषणा की थी। इसके लिए आमेर विकास प्रबंधन प्राधिकरण (एडमा) ने विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर वित्त विभाग और पर्यटन विभाग को भेजा था। अब इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई है और 1.47 करोड़ रुपए का बजट जारी कर दिया गया है।
इन बावड़ियों का होगा जीर्णोद्धार
इस योजना के अंतर्गत छह बावड़ियों का चयन किया गया है, जिनमें सियाराम डूंगरी की बावड़ी, काले हनुमानजी की बावड़ी, परियों का बाग की बावड़ी, नाकू बावड़ी, छिला की बावड़ी और मंशा माता मंदिर की बावड़ी शामिल हैं। इन सभी बावड़ियों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पहचान है।
विभागीय अधिकारियों के अनुसार, इन बावड़ियों का सबसे पहले मिट्टी और मलबा हटाया जाएगा। इसके बाद चूना और सुरखी से प्लास्टर कर उन्हें मूल स्वरूप में लौटाया जाएगा। सीढ़ियों पर चेजा पत्थर की जगह बंशी पहाड़पुर का मजबूत पत्थर लगाया जाएगा। इसके अलावा गेट और लोहे की जालियां भी लगाई जाएंगी ताकि संरचनाएं सुरक्षित रह सकें।
कितना खर्च होगा
प्रस्तावित योजना के अनुसार प्रत्येक बावड़ी पर अलग-अलग राशि खर्च की जाएगी।
सियाराम डूंगरी की बावड़ी पर 38 लाख रुपए
काले हनुमानजी की बावड़ी पर 30 लाख रुपए
परियों का बाग की बावड़ी पर 25 लाख रुपए
नाकू बावड़ी पर 20 लाख रुपए
छिला की बावड़ी पर 18 लाख रुपए
मंशा माता मंदिर की बावड़ी पर 15 लाख रुपए खर्च किए जाएंगे।
कुल मिलाकर इस परियोजना पर 1.48 करोड़ रुपए का निवेश होगा। बारिश के बाद जीर्णोद्धार का कार्य शुरू किया जाएगा ताकि नमी और संरचना से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर बेहतर ढंग से काम हो सके।
बावड़ियों का महत्व और इतिहास
बावड़ियां प्राचीन काल में जल संरक्षण का प्रमुख साधन रही हैं। ये सीढ़ीदार संरचनाएं न केवल पानी संग्रह करती थीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों का भी केंद्र हुआ करती थीं। लोग यहां स्नान, पूजा, सामूहिक आयोजन और यहां तक कि मेलजोल के लिए भी इकट्ठा होते थे।
जयपुर और आमेर क्षेत्र में बनी ये बावड़ियां स्थापत्य कला और जल प्रबंधन के अद्भुत उदाहरण मानी जाती हैं। समय के साथ उपेक्षा और देखरेख के अभाव में इनमें मलबा भर गया और प्लास्टर उखड़ गया। हालांकि 8-10 साल पहले भी इनका जीर्णोद्धार हुआ था, लेकिन नियमित देखभाल नहीं होने के कारण फिर से खराब स्थिति में पहुंच गईं।
जीर्णोद्धार से क्या होगा फायदा
इन बावड़ियों को संरक्षित और पुनर्निर्मित करने से कई फायदे होंगे।
सबसे पहले तो इन बावड़ियों का ऐतिहासिक स्वरूप लौटेगा और लोग इन्हें सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देख सकेंगे।
जल संरक्षण की दृष्टि से भी ये संरचनाएं उपयोगी साबित होंगी। बारिश का पानी इनमें जमा होगा, जिससे आसपास के क्षेत्रों का जलस्तर बढ़ेगा।
पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जयपुर आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक महलों और किलों के साथ-साथ इन बावड़ियों को भी देखने में रुचि रखते हैं। अगर बावड़ियां आकर्षक रूप में प्रस्तुत होंगी तो निश्चित रूप से पर्यटक संख्या में इजाफा होगा।
स्थानीय समुदाय को भी लाभ मिलेगा, क्योंकि इससे रोजगार और व्यवसायिक गतिविधियां बढ़ेंगी।
अधिकारियों की तैयारी
एडमा अधिकारियों का कहना है कि मंजूरी मिलने के बाद अब शॉर्ट टर्म टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। इस प्रक्रिया के बाद ठेकेदारों का चयन कर जीर्णोद्धार का कार्य प्रारंभ किया जाएगा। उम्मीद है कि बारिश के बाद अक्टूबर-नवंबर तक काम गति पकड़ लेगा।


