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राजस्थान में फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट से 24 लोगों ने पाई सरकारी नौकरी

राजस्थान में फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट से 24 लोगों ने पाई सरकारी नौकरी

मनीषा शर्मा।  राजस्थान में एक बार फिर सरकारी नौकरियों में धांधली का मामला सामने आया है। इस बार निशाने पर वे लोग हैं जिन्होंने फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट  (Fake Disability Certificates) का सहारा लेकर सरकारी पदों पर नियुक्ति पा ली। राज्य की स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) की जांच में सामने आया है कि 24 लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी पाई है। एसओजी द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट ने इस गंभीर घोटाले की परतें खोली हैं, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि सरकारी तंत्र में बैठे कुछ लोग योजनाबद्ध तरीके से नियमों को तोड़कर दिव्यांगों के लिए आरक्षित पदों पर काबिज हो गए।

शिकायतों से शुरू हुई जांच, 42 संदिग्धों की सूची तैयार

एसओजी के एसपी ज्ञानचंद यादव के अनुसार, हेल्पलाइन पर लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ व्यक्ति फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं। इन शिकायतों का सत्यापन करने के लिए SOG ने एक विशेष टीम गठित की और शुरू की सूचना एकत्र करने की प्रक्रियाप्रारंभिक जांच में 42 ऐसे संदिग्धों की पहचान की गई, जिन्होंने दिव्यांग कोटे में नौकरी हासिल की थी। SOG ने पहले चरण में इनमें से 29 सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को चिन्हित कर जांच के लिए बुलाया।

SMS मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों से करवाई जांच

SOG ने जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज से संपर्क कर एक विशेष मेडिकल बोर्ड गठित करवाया, जिसमें विभिन्न विशेषज्ञों को शामिल किया गया। इन विशेषज्ञों की निगरानी में 29 कर्मचारियों की दिव्यांगता की दोबारा जांच की गई।

जांच में सामने आया कि:

  • 13 में से सभी 13 श्रवण बाधित श्रेणी के उम्मीदवार फर्जी पाए गए।

  • दृष्टिबाधित श्रेणी के 8 में से 6 ने फर्जी सर्टिफिकेट प्रस्तुत किए थे।

  • लोकोमोटर (चलने-फिरने में असमर्थ) श्रेणी के 8 में से 5 की दिव्यांगता प्रमाणित नहीं हो सकी।

केवल 5 कर्मचारी ही असली दिव्यांग पाए गए, जिनकी दिव्यांगता 40 प्रतिशत या उससे अधिक थी, जो कि सरकार द्वारा तय न्यूनतम सीमा है।

सबसे अधिक ग्रेड थर्ड टीचर निकले फर्जी प्रमाणपत्रधारी

एसओजी की रिपोर्ट में सबसे अधिक 10 कर्मचारी ग्रेड थर्ड शिक्षक के रूप में कार्यरत पाए गए हैं, जिन्होंने झूठे दस्तावेजों के आधार पर दिव्यांग आरक्षण का लाभ उठाकर नौकरी हासिल की। यह बात बेहद गंभीर है, क्योंकि ऐसे शिक्षक बच्चों की शिक्षा को प्रभावित कर रहे हैं और असली पात्र दिव्यांग अभ्यर्थियों का अधिकार छीन रहे हैं।

आगे की कार्रवाई में FIR दर्ज की जाएगी

एसओजी के अनुसार, अब तक की जांच पूरी होने के बाद इन सभी 24 कर्मचारियों और अधिकारियों की जानकारी उनके संबंधित विभागों को भेज दी गई है। संबंधित विभागों को इनके खिलाफ आवश्यक अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। एसपी ज्ञानचंद यादव ने बताया कि अब एसओजी इन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई शुरू करेगी। साथ ही बाकी बचे 13 संदिग्ध मामलों की जांच भी आगे बढ़ रही है।

40% से कम दिव्यांगता वाले नहीं कर सकते सरकारी नौकरी में दावा

SOG द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड ने स्पष्ट रूप से बताया कि जिन कर्मचारियों की दिव्यांगता 40 प्रतिशत से कम पाई गई है, वे सरकारी सेवाओं में दिव्यांग कोटे के पात्र नहीं माने जाएंगे। यही वजह है कि बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर 24 कर्मचारियों को फर्जीवाड़ा का दोषी पाया गया। इस जांच की निगरानी एसओजी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भवानी शंकर मीणा ने की, जिन्होंने SMS मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों से दोबारा जांच करवाई और निष्कर्ष पर पहुंचे कि अधिकांश प्रमाणपत्र झूठे थे।

सरकार के लिए चेतावनी और सिस्टम सुधार की जरूरत

यह पूरा प्रकरण राजस्थान सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है। दिव्यांगों के लिए आरक्षित पदों पर यदि इस तरह फर्जीवाड़ा होता है, तो यह न केवल सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करता है, बल्कि असली दिव्यांग जनों के संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी है। सरकार को अब न केवल इन दोषियों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि भविष्य में ऐसे घोटालों को रोकने के लिए कड़े और डिजिटल तरीके से प्रमाणपत्र सत्यापन की व्यवस्था भी करनी चाहिए।

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