गड़बड़ी सामने आई तो निरस्त करने पड़े चिकित्सा सामग्री खरीद के 5 लाख के टेंडर

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राज्य सरकार ने कोरोना वायरस से निपटने व बेहतर व्यवस्था करने जिले में पिछले दिनाें गुपचुप तरीके से आनन-फानन की किए गए टेंडर आखिरकार चिकित्सा विभाग ने निरस्त कर दिए। टेंडराें की प्रक्रिया पर दैनिक भास्कर ने समाचार प्रकाशित कर इस पूरे मामले में बड़े स्तर पर मिलीभगत काे उजागर किया था।इसके पांच दिन बाद विभाग ने टेंडराें काे ही निरस्त कर नए सिरे से निविदाएं आमंत्रित करने की कवायद शुरू कर दी है। टेंडराें का यह पूरा मामला गुपचुप तरीके से नियमाें काे ताक में रखते हुए किया था।विभाग ने निविदा दाे जून काे जारी की थी। आवेदन प्राप्त करने की अंतिम तिथि दाे दिन बाद यानी चार जून काे ही रखी थी। यह टेंडर भी ऑनलाइन जारी किए थे। टेंडर सात जून को खोलने के बाद 11 जून को सीएमएचओ कार्यालय की तरफ से पत्र जारी कर फर्म से सैंपल मांगे गए थे।बताया जा रहा है कि तीन फर्मो से सैंपल मांगे गए थे। एक फर्म ने तय समय पर सैंपल दिया। दूसरे ने समय पूरा होने के बाद सैंपल जमा कराया। तीसरे फर्म का अब तक सैंपल ही नहीं आया। बिना सैंपल के विभाग किसी निर्णय तक नहीं पहुंच पाया। एक फर्म ने एक्सटेंशन भी मांगा। विभाग की तरफ से एक्सटेंशन भी दिया गया। इसके बावजूद एक्सटेंशन टाइम पूरा होने के बाद सैंपल लेकर आए। ऐसे में सवाल उठे। जबकि निविदा में हाथों-हाथ सैंपल मंगवाने की प्रक्रिया होती है।निविदा शर्त में गड़बड़ी, 24-30 किलोग्राम वजन के बेड से भ्रम फैलाअस्पताल बेड के लिए 24-30 किलो वजन मांगा गया। जबकि वजन निर्धारित होना चाहिए था जैसे 24 किलो या 30 किलो। निविदा प्रपत्र में बेड 24-30 किलो दर्शाने से आवेदन करने वाले भ्रमित हो गए है। बताया जा रहा है कि इस तरह के निविदा प्रपत्र में किलोग्राम निर्धारित होना चाहिए।वजन निर्धारित नहीं होने से रेट नहीं निकल पाती है। पर, खेल ही अपनी चहेती फर्म काे काम देने के लिए किया गया था। टेंडर के निरस्त किए जाने के पीछे यह भी बड़ी वजह के रूप में सामने आ रही है। वहीं एक-दो फर्म ऐसी है जिसके पास पंजीयन तो है, लेकिन काम का अनुभव नहीं है। इनसे भी नमूने मंगवाएं गए।भास्कर पड़ताल में सामने आई थी मौखिक आपत्ति ​निविदा खोले जाने के बाद चार दिन बाद विभाग ने 11 जून को सीएमएचओ कार्यालय ने दो अलग-अलग पत्र जारी किए। पत्र में बताया कि अस्पताल बेड, गद्दे व तकिये की दरें निविदा के जरिये प्राप्त हुई, लेकिन सैंपल नहीं होने से कमेटी कोई निर्णय नहीं ले सकी। इस पर 15 जून को दोपहर एक बजे तक सभी को सैंपल प्रस्तुत करने के लिए कहा गया।भास्कर की तरफ से 19 जून को पड़ताल करने पर सामने आया था कि मात्र एक फर्म ही अपने सैंपल दे सकी। बाकी फर्म अभी तक सैंपल ही प्रस्तुत नहीं कर सकी। ऐसे में मौखिक रुप से इस निविदा प्रक्रिया पर आपत्ति शुरू हो गई थी।यहां हुई थी गड़बड़ीपूरे मामले की पड़ताल में साफ दिखा कि विभाग अपनी किसी चहेती फर्म काे ही टेंडर देना चाहता था। कितनी भी जल्दी हाे, पर टेंडर अखबार में देना चाहिए था। पर, विभाग ने लाखाें का टेंडर ऑनलाइन जारी किया। टेंडर फार्म की राशि ताे ली, पर धराेहर राशि नहीं ली। जबकि, लेखा विभाग का नियम कहता है कि फार्म राशि ले रहे हाे ताे धराेहर राशि भी लेनी चाहिए थी।जल्द खरीदी के तहत टेंडर जारी करने के चार दिन बाद ही सात जून काे टेंडर खाेले। पर, सैंपल के लिए कम दराें वाली तीन फर्म काे आदेश 11 जून काे दिया और 15 जून तक सैंपल प्रस्तुत करने काे कहा। जल्द खरीदी करनी थी ताे सात जून काे सैंपल पेश करने के आदेश दिए जा सकते थे। क्याेंकि, इसी दिन कम दराें वाली तीन फर्माें का भी पता चल गया था।इसके बाद भी सैंपल की तारीखें आगे बढ़ाना स्वत: ही संशय खड़े कर रहा है। बताया जा रहा है कि विभाग ने उदयपुर की एक फर्म काे पहले से ही टेंडर देने तय कर दिया था। ऐसे में इस फर्म की पलंग दर ज्यादा हाेने पर भी इसने सबसे पहले नमूने दे दिए थे। दूसरा नमूना भी इनकाे तय तारीख के दाे दिन बाद मिल गया था और इस फर्म का पलंग दर और गुणवत्ता दाेनाें में बेहतर था। पर, खुलासे के बाद चहेती फर्म काे नियमाें के अनुरूप ऑर्डर मिलने की संभावना कम हाेने पर टेंडर काे निरस्त करना पड़ा।^ सैंपल समय पर नहीं आ सके। दूसरी फर्म भी दिए गए समयावधि के बाद सैंपल लेकर आए। प्रक्रिया को निरस्त कर दिया है। नए सिरे से प्रक्रिया की जा रही है। – डॉ महेंद्र परमार, सीएमएचओ, डूंगरपुर।
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