अभद्र इशारे कर भारतीय जवानों को उकसाते हैं चीनी सैनिक, 1963 में हुए समझौते के कारण नहीं चली गोली

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भारत चीनी सीमा पर हुई झड़प में 20 सैनिक खोने के कारण देशभर में चीन के प्रति गुस्सा है। झड़प लद्दाख के गलवान क्षेत्र में हुई, जो भारत और चीन की सीमा को छूता है। वहां का भूगोल, जलवायु और वर्तमान स्थिति को समझने के लिए भास्कर ने एयरफोर्स में वारंट ऑफिसर के पद से रिटायर हुए भरतपुर के सुदेश शर्मा से बात की, वे 1989 से लेकर 1991 पर गलवान क्षेत्र में तैनात थे।शर्मा ने बताया कि गलवान इलाके में पुराने पहाड़ा हैं, लेकिन समतल स्थान पर भारी तादाद में पत्थर भी हैं। गलवान घाटी समुद्र तल से करीब 15 हजार फीट ऊपर है। इसलिए यहां आक्सीजन की कमी रहती है।जवानों को यहां पोस्टिंग देने से पहले 48 घंटे लेह क्षेत्र में रखा जाता है। ताकि उसका शरीर गलवान के अनुरूप ढल जाए। यहां बाहर और अंदर का प्रेशर अलग-अलग रहता है।भारतीय क्षेत्र में बैनर लगा देते हैं चीनी सैनिकरिटायर्ड ऑफिसर सुरेश शर्मा ने बताया किसीमा पर चीनी सैनिकों की हरकत नई नहीं हैं। भारतीय सैनिकों को उकसाने के लिए वो हरकतें करते रहते हैं। चीनी सैनिक अभद्र बातें कहना, अभद्र इशारे करना, झंडे या बैनर भारतीय क्षेत्र में लगा देना, पत्थर फेंकना जैसे काम करते हैं।कई बार चीनी सैनिक भारतीय सैन्य क्षेत्र में अंदर तक घुस आते हैं और उन्हें खदेड़ते समय विवाद हो जाता है, हालांकि भारतीय सैनिक काफी संयम रखते हैं। लेकिन फिर भी कई बार झड़प हो ही जाती हैं। यहां विवाद गोलीबारी के रूप में नहीं होता। बल्कि हाथापाई, लाठी बाजी और पत्थरबाजी के रूप में होता है। गलवान के वातावरण के कारण सैनिकों को भूख तो ज्यादा लगती है, लेकिन पेट भरकर खा नहीं सकते। इसलिए जवान चिड़चिड़े हो जाते हैं।गश्त करने वाले जवान बंदूक की जगह रखते हैं लाठी-डंडेसन् 1963 में हुए समझौते के तहत गलवान घाटी क्षेत्र में दोनों सेनाएं वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के दोनों ओर 2 किलोमीटर तक हथियार नहीं रख सकतीं। यहां तक कि गश्त पर जाने वाले जवान भी बंदूक नहीं रखते। वे जानवरों से बचाव के लिए लाठियां रखते हैं। इनमें कई बार कुछ जवान लाठी के रूप में लोहे की रॉड भी रख लेते हैं।
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सुदेश शर्मा, सेवानिवृत वारंट ऑफिसर, एयरफोर्स

भारत चीनी सीमा पर हुई झड़प में 20 सैनिक खोने के कारण देशभर में चीन के प्रति गुस्सा है। झड़प लद्दाख के गलवान क्षेत्र में हुई, जो भारत और चीन की सीमा को छूता है। वहां का भूगोल, जलवायु और वर्तमान स्थिति को समझने के लिए भास्कर ने एयरफोर्स में वारंट ऑफिसर के पद से रिटायर हुए भरतपुर के सुदेश शर्मा से बात की, वे 1989 से लेकर 1991 पर गलवान क्षेत्र में तैनात थे।

शर्मा ने बताया कि गलवान इलाके में पुराने पहाड़ा हैं, लेकिन समतल स्थान पर भारी तादाद में पत्थर भी हैं। गलवान घाटी समुद्र तल से करीब 15 हजार फीट ऊपर है। इसलिए यहां आक्सीजन की कमी रहती है।

जवानों को यहां पोस्टिंग देने से पहले 48 घंटे लेह क्षेत्र में रखा जाता है। ताकि उसका शरीर गलवान के अनुरूप ढल जाए। यहां बाहर और अंदर का प्रेशर अलग-अलग रहता है।

भारतीय क्षेत्र में बैनर लगा देते हैं चीनी सैनिक

रिटायर्ड ऑफिसर सुरेश शर्मा ने बताया किसीमा पर चीनी सैनिकों की हरकत नई नहीं हैं। भारतीय सैनिकों को उकसाने के लिए वो हरकतें करते रहते हैं। चीनी सैनिक अभद्र बातें कहना, अभद्र इशारे करना, झंडे या बैनर भारतीय क्षेत्र में लगा देना, पत्थर फेंकना जैसे काम करते हैं।

कई बार चीनी सैनिक भारतीय सैन्य क्षेत्र में अंदर तक घुस आते हैं और उन्हें खदेड़ते समय विवाद हो जाता है, हालांकि भारतीय सैनिक काफी संयम रखते हैं। लेकिन फिर भी कई बार झड़प हो ही जाती हैं। यहां विवाद गोलीबारी के रूप में नहीं होता। बल्कि हाथापाई, लाठी बाजी और पत्थरबाजी के रूप में होता है। गलवान के वातावरण के कारण सैनिकों को भूख तो ज्यादा लगती है, लेकिन पेट भरकर खा नहीं सकते। इसलिए जवान चिड़चिड़े हो जाते हैं।

गश्त करने वाले जवान बंदूक की जगह रखते हैं लाठी-डंडे

सन् 1963 में हुए समझौते के तहत गलवान घाटी क्षेत्र में दोनों सेनाएं वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के दोनों ओर 2 किलोमीटर तक हथियार नहीं रख सकतीं। यहां तक कि गश्त पर जाने वाले जवान भी बंदूक नहीं रखते। वे जानवरों से बचाव के लिए लाठियां रखते हैं। इनमें कई बार कुछ जवान लाठी के रूप में लोहे की रॉड भी रख लेते हैं।

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सुदेश शर्मा, सेवानिवृत वारंट ऑफिसर, एयरफोर्स

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