सेना का वह अफसर जिसने बिना प्रधानमंत्री की परमिशन के चीनी सैनिकों पर बरसा दिए थे तोप के गोले

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लद्दाख की गलवान घाटी में भारत-चीन सैनिकों के बीच सोमवार को हुए खूनी संघर्ष ने 1967 में नाथुला में हुई जंग कीयाद ताजा कर दी। उस दौरान सिक्किम के पासनाथुला में तैनात राजस्थान निवासी जनरल सगत सिंह राठौड़ने सीमा पर उपजे हालात के मुताबिक फैसला लेकर चीनी सेना को जोरदार सबक सिखाया था। दिल्ली से आदेश मिलने का इंतजार करने के बजाएजनरल ने अपनी तोपों का मुंह खुलवा दिया। तीन दिन चली जबरदस्त लड़ाई में चीन के 300 से अधिक सैनिक हताहत हुए। इस लड़ाई के बाद भारतीय सेना में चीन के 1962 के युद्ध का खौफ पूरी तरह से निकल गया था।साल 1967 की लड़ाई के बाद नाथुला में जनरल मानेक शॉ के बायीं तरफ खड़े जनरल सगत सिंह।’लीडरशिप इन द इंडियन आर्मी’ के लेखक मेजर जनरल वीके सिंह ने अपनी किताब में उस लड़ाई का विस्तार से उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है किचीन ने भारत को एक तरह से अल्टीमेटम दिया कि वो सिक्किम की सीमा पर नाथुला और जेलेपला की सीमा चौकियों को खाली कर दे। तब सेना के कोर मुख्यालय के प्रमुख जनरल बेवूर ने जनरल सगत सिंह का आदेश दिया कि आप इन चौकियों को खाली कर दीजिए। लेकिन जनरल सगत इसके लिए तैयार नहीं हुए।नाथुला ऊंचाई पर है और वहां से चीनी क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है, उस पर नजर रखी जा सकती है। जनरल सगत ने नाथुला खाली करने से इनकार कर दिया। दूसरी तरफ़ 27 माउंटेन डिविज़न ने जिसके अधिकार क्षेत्र में जेलेप ला आता था, वो चौकी खाली कर दी। चीन के सैनिकों ने फौरन आगे बढ़कर उस पर कब्ज़ा भी कर लिया। ये चौकी आज तक चीन के नियंत्रण में है।वर्ष 1967 में इस तरह ट्रकों को दुर्गम रास्तों पर आगे ले गए थे भारतीय सैनिक।उस समय नाथु ला में तैनात मेजर जनरल शेरू थपलियाल ‘इंडियन डिफ़ेस रिव्यू’ के 22 सितंबर, 2014 के अंक में लिखा हैं कि नाथु ला में दोनों सेनाओं का दिन कथित सीमा पर गश्त के साथ शुरू होता था और इस दौरान दोनों देशों के फ़ौजियों के बीच कुछ न कुछ तकरार हो जाती थी। दोनों तरफ़ के सैनिक एक दूसरे से मात्र एक मीटर की दूरी पर खड़े रहते थे। वहाँ पर एक नेहरू स्टोन हुआ करता था। ये वही जगह थी जहाँ से होकर जवाहर लाल नेहरू 1958 में ट्रेक करते हुए भूटान में दाखिल हुए थे। थोड़े दिनों बाद भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हो रही कहासुनी धक्का-मुक्की में बदल गई।वर्ष 1967 में नाथु ला सेक्टर में चीनी सैनिक।तार की बाड़ लगाने का फ़ैसलाइलाके में तनाव कम करने के लिए भारतीय सैनिक अधिकारियों ने तय किया कि वो नाथु ला से सेबु ला तक भारत चीन सीमा को डिमार्केट करने के लिए तार की एक बाड़ लगाएंगे। 11 सितंबर की सुबह जवानों ने बाड़ लगानी शुरू कर दी। जैसे ही काम शुरू हुआ चीन ने इसका विरोध किया और कहा कि वो तार बिछाना बंद कर दें। लेकिन उनको आदेश थे कि चीन के ऐसे किसी अनुरोध को स्वीकार न किया जाए।नाथु ला सेक्टर में नेहरू स्टोन। यहीं से होकर पंडित नेहरू ने वर्ष 1958 में भूटान में प्रवेश किया था।चीनियों ने शुरू की फायरिंगगत वर्ष जुलाई में जोधपुर के सैन्य क्षेत्र में जनरल सगत सिंह की प्रतिमा अनावरण में पहुंचे उनकी जीवनी के लेखक पूर्व मेजर जनरल रंधीर सिंह ने बताया था कि लेफ़्टिनेट कर्नल राय सिंह को जनरल सगत सिंह ने आगाह किया था कि वो बंकर में ही रहकर तार लगवाने पर निगरानी रखें, लेकिन वो खुले में ही खड़े होकर अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ा रहे थे। अचानक एक सीटी बजी और चीनियों ने भारतीय सैनिकों पर ऑटोमेटिक फ़ायर शुरू कर दिया। राय सिंह को तीन गोलियां लगीं। मिनटों में ही जितने भी भारतीय सैनिक खुले में खड़े थे या काम कर रहे थे, धराशाई कर दिए गए। फ़ायरिंग इतनी ज़बरदस्त थी कि भारतीयों को अपने घायलों तक को उठाने का मौका नहीं मिला। हताहतों की संख्या इसलिए भी अधिक थी क्योंकि भारत के सभी सैनिक बाहर थे और वहां आड़ लेने के लिए कोई जगह नहीं थी।और आग उगलने लगी भारतीय तोपेंजब सगत सिंह ने देखा कि चीनी असरदार फ़ायरिंग कर रहे हैं। उस समय तोपख़ाने की फ़ायरिंग का हुक्म देने का अधिकार सिर्फ़ प्रधानमंत्री के पास था। यहां तक कि सेनाध्यक्ष को भी ये फ़ैसला लेने का अधिकार नहीं था, लेकिन जब ऊपर से कोई हुक्म नहीं आया और चीनी दबाव बढ़ने लगा तो जनरल सगत सिंह ने तोपों से फ़ायर खुलवा दिया। इसके बाद तो पूरे स्तर पर लड़ाई शुरू हो गई जो तीन दिन तक चली। जनरल सगत सिंह ने नीचे से मध्यम दूरी की तोपें मंगवाईं और चीनी ठिकानों पर ज़बरदस्त गोलाबारी शुरू कर दी। भारतीय सैनिक ऊंचाई पर थे और उन्हें चीनी ठिकाने साफ़ नज़र आ रहे थे, इसलिए उनके गोले निशाने पर गिर रहे थे। जवाब में चीनी भी फ़ायर कर रहे थे। लेकिन उनकी फ़ायरिंग अंधाधुंध थी क्योंकि वो नीचे से भारतीय सैनिकों को नहीं देख पा रहे थे। इससे चीन को बहुत नुक्सान हुआ और उनके 300 से अधिक सैनिक मारे गए। तीन दिन बाद 15 सितंबर, 1967 को यह लड़ाई थमी। जनरल वीके सिंह ने भी इस बारे में लिखा कि 1962 की लड़ाई के बाद भारतीय सेना के जवानों में चीन की जो दहशत हो गई थी वो हमेशा के लिए जाती रही। भारत के जवान को पता लग गया कि वो भी चीनियों को मार सकता है।
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नाथु ला। इसी क्षेत्र में वर्ष 1967 में भारतीय सेना ने चीनी सेना को करारी मात दी थी।

लद्दाख की गलवान घाटी में भारत-चीन सैनिकों के बीच सोमवार को हुए खूनी संघर्ष ने 1967 में नाथुला में हुई जंग कीयाद ताजा कर दी। उस दौरान सिक्किम के पासनाथुला में तैनात राजस्थान निवासी जनरल सगत सिंह राठौड़ने सीमा पर उपजे हालात के मुताबिक फैसला लेकर चीनी सेना को जोरदार सबक सिखाया था। दिल्ली से आदेश मिलने का इंतजार करने के बजाएजनरल ने अपनी तोपों का मुंह खुलवा दिया। तीन दिन चली जबरदस्त लड़ाई में चीन के 300 से अधिक सैनिक हताहत हुए। इस लड़ाई के बाद भारतीय सेना में चीन के 1962 के युद्ध का खौफ पूरी तरह से निकल गया था।

साल 1967 की लड़ाई के बाद नाथुला में जनरल मानेक शॉ के बायीं तरफ खड़े जनरल सगत सिंह।

‘लीडरशिप इन द इंडियन आर्मी’ के लेखक मेजर जनरल वीके सिंह ने अपनी किताब में उस लड़ाई का विस्तार से उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है किचीन ने भारत को एक तरह से अल्टीमेटम दिया कि वो सिक्किम की सीमा पर नाथुला और जेलेपला की सीमा चौकियों को खाली कर दे। तब सेना के कोर मुख्यालय के प्रमुख जनरल बेवूर ने जनरल सगत सिंह का आदेश दिया कि आप इन चौकियों को खाली कर दीजिए। लेकिन जनरल सगत इसके लिए तैयार नहीं हुए।

नाथुला ऊंचाई पर है और वहां से चीनी क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है, उस पर नजर रखी जा सकती है। जनरल सगत ने नाथुला खाली करने से इनकार कर दिया। दूसरी तरफ़ 27 माउंटेन डिविज़न ने जिसके अधिकार क्षेत्र में जेलेप ला आता था, वो चौकी खाली कर दी। चीन के सैनिकों ने फौरन आगे बढ़कर उस पर कब्ज़ा भी कर लिया। ये चौकी आज तक चीन के नियंत्रण में है।

वर्ष 1967 में इस तरह ट्रकों को दुर्गम रास्तों पर आगे ले गए थे भारतीय सैनिक।

उस समय नाथु ला में तैनात मेजर जनरल शेरू थपलियाल ‘इंडियन डिफ़ेस रिव्यू’ के 22 सितंबर, 2014 के अंक में लिखा हैं कि नाथु ला में दोनों सेनाओं का दिन कथित सीमा पर गश्त के साथ शुरू होता था और इस दौरान दोनों देशों के फ़ौजियों के बीच कुछ न कुछ तकरार हो जाती थी। दोनों तरफ़ के सैनिक एक दूसरे से मात्र एक मीटर की दूरी पर खड़े रहते थे। वहाँ पर एक नेहरू स्टोन हुआ करता था। ये वही जगह थी जहाँ से होकर जवाहर लाल नेहरू 1958 में ट्रेक करते हुए भूटान में दाखिल हुए थे। थोड़े दिनों बाद भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हो रही कहासुनी धक्का-मुक्की में बदल गई।

वर्ष 1967 में नाथु ला सेक्टर में चीनी सैनिक।

तार की बाड़ लगाने का फ़ैसला
इलाके में तनाव कम करने के लिए भारतीय सैनिक अधिकारियों ने तय किया कि वो नाथु ला से सेबु ला तक भारत चीन सीमा को डिमार्केट करने के लिए तार की एक बाड़ लगाएंगे। 11 सितंबर की सुबह जवानों ने बाड़ लगानी शुरू कर दी। जैसे ही काम शुरू हुआ चीन ने इसका विरोध किया और कहा कि वो तार बिछाना बंद कर दें। लेकिन उनको आदेश थे कि चीन के ऐसे किसी अनुरोध को स्वीकार न किया जाए।

नाथु ला सेक्टर में नेहरू स्टोन। यहीं से होकर पंडित नेहरू ने वर्ष 1958 में भूटान में प्रवेश किया था।

चीनियों ने शुरू की फायरिंग
गत वर्ष जुलाई में जोधपुर के सैन्य क्षेत्र में जनरल सगत सिंह की प्रतिमा अनावरण में पहुंचे उनकी जीवनी के लेखक पूर्व मेजर जनरल रंधीर सिंह ने बताया था कि लेफ़्टिनेट कर्नल राय सिंह को जनरल सगत सिंह ने आगाह किया था कि वो बंकर में ही रहकर तार लगवाने पर निगरानी रखें, लेकिन वो खुले में ही खड़े होकर अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ा रहे थे। अचानक एक सीटी बजी और चीनियों ने भारतीय सैनिकों पर ऑटोमेटिक फ़ायर शुरू कर दिया। राय सिंह को तीन गोलियां लगीं। मिनटों में ही जितने भी भारतीय सैनिक खुले में खड़े थे या काम कर रहे थे, धराशाई कर दिए गए। फ़ायरिंग इतनी ज़बरदस्त थी कि भारतीयों को अपने घायलों तक को उठाने का मौका नहीं मिला। हताहतों की संख्या इसलिए भी अधिक थी क्योंकि भारत के सभी सैनिक बाहर थे और वहां आड़ लेने के लिए कोई जगह नहीं थी।
और आग उगलने लगी भारतीय तोपें
जब सगत सिंह ने देखा कि चीनी असरदार फ़ायरिंग कर रहे हैं। उस समय तोपख़ाने की फ़ायरिंग का हुक्म देने का अधिकार सिर्फ़ प्रधानमंत्री के पास था। यहां तक कि सेनाध्यक्ष को भी ये फ़ैसला लेने का अधिकार नहीं था, लेकिन जब ऊपर से कोई हुक्म नहीं आया और चीनी दबाव बढ़ने लगा तो जनरल सगत सिंह ने तोपों से फ़ायर खुलवा दिया। इसके बाद तो पूरे स्तर पर लड़ाई शुरू हो गई जो तीन दिन तक चली। जनरल सगत सिंह ने नीचे से मध्यम दूरी की तोपें मंगवाईं और चीनी ठिकानों पर ज़बरदस्त गोलाबारी शुरू कर दी। भारतीय सैनिक ऊंचाई पर थे और उन्हें चीनी ठिकाने साफ़ नज़र आ रहे थे, इसलिए उनके गोले निशाने पर गिर रहे थे। जवाब में चीनी भी फ़ायर कर रहे थे। लेकिन उनकी फ़ायरिंग अंधाधुंध थी क्योंकि वो नीचे से भारतीय सैनिकों को नहीं देख पा रहे थे। इससे चीन को बहुत नुक्सान हुआ और उनके 300 से अधिक सैनिक मारे गए। तीन दिन बाद 15 सितंबर, 1967 को यह लड़ाई थमी। जनरल वीके सिंह ने भी इस बारे में लिखा कि 1962 की लड़ाई के बाद भारतीय सेना के जवानों में चीन की जो दहशत हो गई थी वो हमेशा के लिए जाती रही। भारत के जवान को पता लग गया कि वो भी चीनियों को मार सकता है।

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नाथु ला। इसी क्षेत्र में वर्ष 1967 में भारतीय सेना ने चीनी सेना को करारी मात दी थी।

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